Stotra · Durga

Durga Devi Atharvashirsham

दुर्गा सप्तशती देवी अथर्वशीर्षम्

देव्यथर्वशीर्षम् जिसे देवी अथर्वशीर्षम् के नाम से भी जाना जाता है, चण्डी पाठ से पहले पाठ किये जाने वाले छह महत्त्वपूर्ण स्तोत्रम् हिस्सा है। कवचम्, अर्गला, कीलकम्, वेदोक्तम् रात्रि सूक्तम्, तन्त्रोक्तम् रात्रि सूक्तम् और देव्यथर्वशीर्षम् का पाठ दुर्गा सप्तशती के मुख्य अध्यायों का पाठ करने से पहले दिये गये क्रम में किया जाता है।

श्रीदेव्यथर्वशीर्षम्

ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति॥

प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च॥

अहमानन्दानानन्दौ। अहं विज्ञानाविज्ञाने।

अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये।

अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि।

अहमखिलं जगत्॥

वेदोऽहमवेदोऽहम्। विद्याहमविद्याहम्। अजाहमनजाहम्।

अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम्॥

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि।

अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।

अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि।

अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ॥

अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधामि।

अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि॥

सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते।

चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।

योनिरप्स्वन्तः समुद्रे।

य एवं वेद।

स दैवीं सम्पदमाप्नोति॥

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।

नियताः प्रणताः स्म ताम्॥

वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम्।

प्रपद्यामहेऽसुरान्नाशयित्र्यै ते नमः॥

देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।

सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु॥

कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्।

सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्॥

महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि।

तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव।

तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः॥

कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः।

पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम्॥

एषाऽऽत्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी। पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा।

एषा श्रीमहाविद्या। य एवं वेद स शोकं तरति॥

मातरस्मान् पाहि सर्वतः॥

सैषाष्टौ वसवः। सैषैकादश रुद्राः।

सैषा द्वादशादित्याः।

सोमपा असोमपाश्च।

रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः।

सैषा सत्त्वरजस्तमांसि।

सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी।

सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः।

सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि।

कलाकाष्ठादिकालरूपिणी।

तामहं प्रणौमि नित्यम्॥

भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम्।

शरण्यां शिवदां शिवाम्॥

वीतिहोत्रसमन्वितम्।

बीजं सर्वार्थसाधकम्॥

यतयः शुद्धचेतसः।

ज्ञानाम्बुराशयः॥

वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम्।

सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसंयुक्तष्टात्तृतीयकः।

नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः।

विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः॥

हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम्।

पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम्।

त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे॥

महाभयविनाशिनीम्।

महाकारुण्यरूपिणीम्॥

जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया।

तस्मादुच्यते अनन्ता।

तस्मादुच्यते अलक्ष्या।

तस्मादुच्यते अजा।

तस्मादुच्यते एका।

तस्मादुच्यते नैका।

अज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति॥

मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी।

शून्यानां शून्यसाक्षिणी।

सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता॥

तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम्।

नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम्॥

पञ्चाथर्वशीर्षजपफलमाप्नोति।

सोऽर्चासिद्धिं न विन्दति।

शतमष्टोत्तरं चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः।

दशवारं पठेद् यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते।

महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः॥

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।

सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति।

निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति।

नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति।

प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति।

भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति।

स महामृत्युं तरति य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥

इति श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् सम्पूर्णम्

प्रति वर्ष पन्द्रह दिवसीय देवी पक्ष के समय विभिन्न प्रकार से दुर्गा पूजा की जाती है, जो नवरात्रि, दुर्गोत्सव, तथा शारदोत्सव के रूप में भी लोकप्रिय है। दुर्गा पूजा में देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, भगवान गणेश, एवं भगवान कार्तिकेय का भी पूजन किया जाता है।

नवरात्रि में देवी की उपासना की शुरुआत घटस्थापना से ही होती है। जिसके लिये शुभ मुहूर्त का चयन करना सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। इस पृष्ठ पर घटस्थापना के लिये, आपके शहर के अनुसार सर्वाधिक शुभ मुहूर्त की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यहाँ दुर्गा पूजा की सम्पूर्ण समय सारणी प्रकाशित की गयी है। दुर्गा पूजा एक महत्पूर्ण हिन्दु त्यौहार है, जो दुर्गोत्सव एवं शारदोत्सव के नाम से भी लोकप्रिय है। दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर देवी माँ दुर्गा के नवदुर्गा रूपों की विशेष पूजा-आराधना की जाती है।

शरद ऋतु से सम्बन्धित होने के कारण आश्विन माह की नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि भी कहते हैं। विश्व भर के देवी उपासक इस पर्व की प्रतीक्षा करते हैं, जिसके कारण यह नवरात्रि बेहद लोकप्रिय है इसीलिये इसे 'महानवरात्रि' भी कहते हैं। इस पृष्ठ पर आपको शारदीय नवरात्रि पर्व के दिन और अन्य बहुत सी महत्त्वपूर्ण जानकारियों के पृष्ठ मिल जायेंगे।

यहाँ आप नवरात्रि पर्व के समय की जाने वाली सन्धि पूजा का मुहूर्त एवं अवधि ज्ञात कर सकते हैं। सन्धि पूजा, अष्टमी तिथि के समापन एवं नवमी तिथि के आरम्भ एक विशेष मुहूर्त में की जाती है। इस विशेष मुहूर्त में ही चण्ड-मुण्ड नामक दैत्यों का वध करने हेतु देवी चामुण्डा का प्राकट्य हुआ था।

विजयादशमी के दिन भगवान श्री राम ने रावण तथा देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक दैत्य का वध किया था। अतः इस दिन को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाया जाता है। विजयदशमी के अवसर पर शमी पूजा, अपराजिता पूजा तथा सीमोल्लंघन आदि अनुष्ठान किये जाते हैं।

प्राचीन काल से ही महा नवरात्रि की महानवमी के अवसर पर आयुध पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी दुर्गा ने नौ दिवसीय भीषण युद्ध के उपरान्त महिषासुर दैत्य को पराजित किया था। दक्षिण भारत में इस पर्व को सरस्वती पूजा के रूप में भी मनाया जाता है।

इस पृष्ठ पर दुर्गा पूजा के समय उपयोग होने वाली नौ प्रकार की पत्तियों का विवरण प्रदान किया गया है, जिन्हें नवपत्रिका कहा जाता है। नौ पत्तियों द्वारा देवी दुर्गा की पूजा को नवपत्रिका पूजा के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में यह पर्व कोलाबोऊ पूजा के नाम से लोकप्रिय है।

अम्बे तू है जगदम्बे काली, देवी दुर्गा को समर्पित सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय आरती है। देवी माँ से सम्बन्धित विभिन्न अवसरों सहित दैनिक पूजन में भी इस आरती का गायन किया जाता है। यह आरती अत्यन्त मधुर एवं कर्णप्रिय है तथा इसके गायन से माता रानी प्रसन्न होती हैं।

श्री दुर्गा चालीसा, देवी दुर्गा को समर्पित ४० छन्दों से युक्त एक प्रार्थना है, जिसका भक्तिपूर्वक पाठ करने से देवी माँ अत्यन्त प्रसन्न होकर कृपा करती हैं। देवी दुर्गा हिन्दु धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं। देवी दुर्गा की कृपा से भक्तों को शक्ति, साहस एवं वीरता की प्राप्ति होती है।

यहाँ देवी दुर्गा माता के १०८ पवित्र नामों की सूची प्रदान की गयी है, जिसे अष्टोत्तर शतनामावली भी कहा जाता है। देवी माँ के यह १०८ नाम हृदय को शीतलता प्रदान करने वाले हैं। प्रतिदिन इन १०८ नामों का पाठ करने से देवी माँ के आशीर्वाद साहित उत्साह एवं आनन्द में वृद्धि होती है।

श्री दुर्गा सप्तशती, देवी दुर्गा को समर्पित ७०० श्लोकों तथा १३ अध्यायों में विभक्त एक प्रसिद्ध धर्मग्रन्थ है, जिसका उद्भव ऋषि मार्कण्डेय द्वारा रचित मार्कण्डेय पुराण से हुआ है। दुर्गा सप्तशती के पाठ से साधक विभिन्न सिद्धियों को अर्जित कर अन्ततः उत्तम गति को प्राप्त होता है।

देवी माता पार्वती को शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा आदि नौ भिन्न-भिन्न रूपों में पूजा जाता है। माता पार्वती के यही नौ रूप समस्त संसार में नवदुर्गा के रूप में विख्यात हैं। नवरात्रि उत्सव के समय देवी माँ के दिव्य नवदुर्गा स्वरूपों की विस्तृत पूजा-आराधना की जाती है।

देवी शक्ति के १० मुख्य स्वरूपों को दश महाविद्या के रूप में पूजा जाता है। दश महाविद्या विभिन्न दिशाओं की अधिष्ठातृ शक्तियाँ हैं। दश महाविद्या की पूजा एवं साधना के माध्यम से साधकों को विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

यहाँ दुर्गा पूजा के अवसर पर अपने मित्रों एवं परिजनों को भेजने के लिये आकर्षक ग्रीटिंग्स एवं ई-कार्ड्स दिये गये हैं। यह ग्रीटिंग्स एवं ई-कार्ड्स हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में देवी माँ के सुन्दर चित्रों के साथ प्रकाशित किये गये हैं।

यहाँ देवी माँ को समर्पित नवरात्रि उत्सव के ग्रीटिंग्स तथा ई-कार्ड्स दिये गये हैं, जिनके माध्यम से आप अपने मित्रों एवं प्रियजनों के नवरात्रि के इस पवित्र उत्सव की शुभकामनायें प्रेषित कर सकते हैं। यह ग्रीटिंग्स देवी माता के मनोभावन चित्रों के साथ उपलब्ध हैं।

यहाँ बंगाल की सुन्दर अल्पना कलाकृतियाँ बनाने की विधि छायाचित्रों के माध्यम से चरणबद्ध रूप से प्रस्तुत की गयी है। प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा के अन्तर्गत विभिन्न रँगो से निर्मित रँगोलियों को अल्पना के नाम से जाना जाता है। महत्त्वपूर्ण मांगलिक अवसरों पर अल्पना रचना की जाती है।

यहाँ सम्पूर्ण घटस्थापना विधि विस्तार पूर्वक प्रदान की गयी है। घटस्थापना नवरात्रि उत्सव का प्रमुख एवं अति आवश्यक भाग है। नवरात्रि के प्रथम दिवस पर घटस्थापना के माध्यम से कलश में देवी माँ का आवाहन किया जाता है। तदोपरान्त ही नवरात्रि पूजन एवं व्रत का शुभारम्भ हो जाता है।

यहाँ नवरात्रि के समय उपयोग होने वाले ७ प्रकार के अनाजों सचित्र वर्णन किया गया है, जिन्हें सामूहिक रूप से सप्तधान्य के नाम से जाना जाता हैं। सप्तधान्य के अन्तर्गत जौ, तिल, धान, मूँग तथा कँगनी आदि अनाजों को सम्मिलित किया गया है, जो देवी माँ को अत्यधिक प्रिय होते हैं।

यहाँ दुर्गा पूजा के समय मन्त्र सहित पुष्पाञ्जलि अर्पित करने की विस्तृत विधि प्रदान की गयी है। दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर उनमें पुष्प लेकर अर्पित करने की क्रिया को पुष्पाञ्जलि कहते हैं। देवी माँ के अनेक प्रमुख देवालयों में नियमित रूप से प्रत्येक सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तिथि पर पुष्पाञ्जलि अर्पित की जाती है।

धुनुची नृत्य, दुर्गा पूजा के समय किया जाने वाला अत्यधिक लोकप्रिय नृत्य है। धुनुची नृत्य के अन्तर्गत दोनों हाथों में मिट्टी की धुनाची में दहकती हुयी धूप लेकर देवी दुर्गा के समक्ष नृत्य किया जाता है। नृत्य हेतु ढाक नामक पारम्परिक वाद्य यन्त्र का प्रयोग भी किया जाता है।

यहाँ नवरात्रि के समय की जाने वाली दुर्गा पूजा हेतु षोडशोपचार दुर्गा पूजा विधि चरणबद्ध एवं विस्तृत रूप में प्रदान की गयी है। षोडशोपचार पूजन में धर्मग्रन्थों द्वारा वर्णित सोलह चरणों के माध्यम से माता रानी की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा की षोडशोपचार पूजा करने से सुख-शान्ति एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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